महा शिवरात्रि क्यों मनाई जाती है। जानें शिवरात्रि का महत्व।

भारत त्योहारों का देश है

भारतीय संस्कृति प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन मे जश्न मनाने के लिए अवसर प्रदान करती है। हिंदू धर्म जीवन के बारे में बात करते हुए, यह मानता है कि यह एक उत्सव है और लोगों को अपने जीवन मे उत्सव बनाने के लिए कई त्यौहार प्रदान करता है।

ऐसा एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार महा शिवरात्री है।

महा शिवरात्रि भगवान शिव को समर्पित एक वार्षिक उत्सव है। यह माना जाता है कि इस दिन भगवान शिव का देवी पार्वती से विवाह हुआ था। यह लोकप्रिय ‘शिवरात्रि’ या ‘शिव की महान रात’ के रूप में जाना जाता है।

पौर्णिमा-एंट महीने की गणना के अनुसार, महा शिवरात्रि का उत्सव कृष्ण पक्ष त्रयोडशी या हिंदू कैलेंडर महीने की “फाल्गुन” माह मे मनाया जाता है, जो सामान्यतः फरवरी या मार्च माह में आता है। एक साल में, 12 शिवरात्रि आती हैं, हालांकि महा शिवरात्रि पवित्र है।

महा शिवरात्री का त्योहार मुख्य रूप से भगवान शिव को ‘बेला’ पत्तियों को समर्पित करके मनाया जाता है। महा शिवरात्रि पे भक्त पूरे दिन व्रत रख्ते है और पूरी रात जागरण कर्ते है। इस दिन “ओम नमः शिवाय” मंत्र का बहुत महत्व है और भक्त पुरे दिन ओम नमः शिवाय मंत्र का जाप करने है।

महा शिवरात्रि का महत्व

भगवान से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए भक्त ध्यान और तपस्या करते हैं। इस शुभ दिन पर, ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है कि भक्त अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को और अधिक आसानी से उत्थान करने में मदद मिलती है। महाशिवरात्रि के दिन सबसे शक्तिशाली शिव मंत्र, “महामतीयुग्जय मंत्र” का जप करके भक्तों का लाभ मिलता है।

कहा जाता है कि महा शिवरात्रि के दिन,  निशिता कला (रात के 8 वें मुहूर्त) शिव पूजा करने का आदर्श समय है।

हिंदू शास्त्रों के अनुसार, यह वह समय है जब भगवान शिव पृथ्वी पर “लिंग” के रूप में प्रकट हुए। सभी शिव मंदिरों में, सबसे पवित्र लिंगोत्भव पूजा महा शिवरात्रि के दिन की जाती है।

भक्त महा शिवरात्री के शुभ दिन मनाते हैं और वे उपवास करते है और भगवान शिव को विशेष प्रार्थना करते हैं। वे शिव लिंग पर दूध और पानी चढ़ाते हैं और सुंदर फूलों से सजाते हैं। वे विभिन्न तीर्थ स्थलों पर पवित्र डुबकी भी लगाते हैं।

भक्त पूजा करने के लिए मन्दिर जाते हैं और सर्वशक्तिमान भगवान शिव के “रुद्रा अभिषेक” के भी साक्षी बन्ते हैं। कुछ भक्त और साधु “ठंडई” एक विशेष पेय लेते हैं जो भांग और दूध से बना होता है।

भारत के अलावा, महाशिवरात्रि को नेपाल जैसे दुनिया के अन्य हिस्सों में भि मनाया जाता है जहां प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर में लाखों भक्त महा शिवरात्रि समारोहों में भाग लेते हैं। इसी तरह सभी हिंदू दुनिया भर में महा शिवरात्री मनाते हैं।

वे भगवान शिव को विशेष “झोल” पेश करते हैं।

महा शिवरात्रि का इतिहास और मूल

पुराण में कई पौराणिक कहानियां शामिल हैं जो महा शिवरात्रि के त्योहार की उत्पत्ति का वर्णन करती हैं।

एक लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, यह कहा जाता है कि निराकार भगवान महा शिवरात्रि की आधी रात को “लिंगाओ भव मूर्ति” के रूप में प्रकट हुए। ऐसा माना जाता है कि यहि कारण भगवान शिव के भक्त भगवान कि प्रार्थना करते है और महा शिवरात्री का पर्व मनाते है।

पुराणों में वर्णित एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान समुद्री जहरीली जहर का एक बर्तन उभरा। यह घातक जहर पूरे विश्व का खत्म करने में सक्षम था। देवों और राक्षसों ने इस घातक जहर से डरते हुए भगवान शंकर से मदद के लिए संपर्क किया।

विश्व की रक्षा करने के लिए, भगवान शंकर ने घातक जहर पी लिया और इसे अपने गले में रखा। इसने उनका गला नीला बना दिया और उन्हें “नीलकंथा” नामित किया गया ( नीले गले वाला)। भगवान शंकर ने इस घातक जहर से दुनिया को बचाया इस घटना का जश्न महा शिवरात्रि के तोर पे मनाया जाता है।

भगवान शंकर ने घातक जहर पी लिया और इसे अपने गले में रखा

शिव पुराण में वर्णित एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार जब हिंदू देवताओं, ब्रह्मा और विष्णु के बीच यह जानने के लिए लड़ाई हुई कि कौन सर्वश्रेष्ठ है। युद्ध की तीव्रता देखते हुए अन्य देवता डर गए और उन्होंने भगवान शिव से हस्तक्षेप का अनुरोध किया। भगवान शिव ब्रह्मा और विष्णु की लड़ाई में हस्तक्षेप करने के लिए सहमत हुए।

सर्वशक्तिमान शिव ने दोनों भगवानों के बीच में एक विशाल स्तंभ का रूप ग्रहण किया और दोनों से कहा जो इस स्तंभ का शुरूआत या अंत ढूंढ लेगा वही सर्वशक्तिमान होगा।

ब्रह्मा ने हंस का रूप लिया और विष्णु ने वराह का ब्रह्मा ऊपर की तरफ खोजने निकले और विष्णु नीचे की तरफ पर दोनों ही उसका आरंभ और अंत ना ढूंढ पाए।

अपनी यात्रा के दौरान ब्रह्मा को केतकी पुष्प मिला और उन्होंने निर्णय लिया कि उसे साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत करके वह कहेंगे कि उन्होंने आरंभ ढूंढ लिया।

इस पर, भगवान शिव अपने असली स्वरूप प्रकट किया। उन्होंने उन्हें शाप दे के ब्रह्मा को दंडित किया कि कोई भी कभी उनकि प्रार्थना नहीं करेगा। यह फागुन मास के 14 दिन की अंधेरी रात थी जिस दिन शिव पहली बार लिंग रूप में प्रकट हुए इसलिए यह रात शुभ मानी जाती है और महाशिवरात्रि के रूप में मनाई जाती है।

शिवरात्रि के दिन शिव की पूजा करने से खुशियां और सौभाग्य प्राप्त होता है।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार एक गरीब आदिवासी था जो भगवान शिव का भक्त था और उसने पूरी रात शिव की पूजा की।

एक दिन वह गहरे घने जंगल में गया पर रात होने से पहले वापस ना आ सका रात घनी होती गई और वह जंगली जानवरों के डर से पेड़ पर चढ़ गया और पूरी रात वहीं बिताई।

परंतु उसे डर था कि कहीं उसे नींद ना लग जाए और वह पेड़ से गिर ना जाए इसलिए उसने निश्चय किया कि वह पेड़ की पत्तियां एक-एक करके फेकता जाएगा और भगवान शिव के मंत्र का जाप करेगा भोर होते ही उसे पता चला कि उसने हजारो पत्तियां शिवलिंग पर अर्पित कर दिये थे और वह एक बेल का पेड़ था।

उस आदिवासी द्वारा पूरी रात भगवान शिव की पूजा से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे दिव्य आनंद का आशीर्वाद दिया। यह कहानी श्रद्धालुओं को व्रत रखने के लिए प्रेरित करती है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन दो शक्तियों शिव और शक्ति का मिलन हुआ था। पुराणों के अनुसार इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था।

इस प्रकार, महा शिवरात्रि हिंदुओं के सबसे शुभ उत्सवों में से एक है। यह दुनियाभर में लाखों भक्तों द्वारा मनाया जाता है। यह वह दिन है जब हमें ब्रह्मांड की सबसे बड़ी शक्ति भगवान शिव की आराधना के रूप में मनाया जाता है। यह वह दिन भी है जब भगवान शिव अपने भक्तों को शांति और समृद्धि के साथ आशीष देते हैं।

महा शिवरात्रि तिथि 2022

महा शिवरात्रि 1 मार्च 2022 मंगलवार को मनाई जाएगी।

निशिता काल पूजा का समय: 11:56 अपराह्न से 12:45 पूर्वाह्न, 2 मार्च

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